"विदिशा और प्राचीन भारतीय साहित्य "
विदिशा का इतिहास बेहद विशाल है। एक लेख में या एक किताब में समेटना असंभव। ऐसे तो नया विदिशा देखके बिलकुल भी नहीं लगता है कि यह वही विदिशा है जो कभी 6-5 ईसापूर्व में विश्व का एक बड़ा व्यापार केंद्र था।
विदिशा का उल्लेख कई प्राचीन भारतीय और विदेशी साहित्य में पाया जाता है। विदिशा की आर्थिक समृधि देखते ही बनती थी। इस आर्थिक समृधि का एक बड़ा महत्वपूर्ण कारण ये भी था की विदिशा भारत के दो बड़े व्यापर मार्ग पर स्थित था। पहला उज्जैन और कोशाम्बी (इलाहाबाद ) को जोड़ने वाला और दूसरा भरूच (गुजरात) और मथुरा को जोड़ने वाला।
विदिशा का उल्लेख वाल्मीकिकृत 'रामायण' , 'महाभारत', कालीदासकृत 'मेघदूत', कालीदासकृत 'मालविकाग्निमित्रम' , बाणभट्टकृत ' कादम्बरी' आदि में देखने को मिलता है।
कालिदास ने मेघदूत में लिखा है-
"तेषां दिक्षु प्रथित विदिशालक्षणा राजधानीम,
गत्वा सघं फलमविकलं कमुकत्वस्य लब्ध्वा''
अनुवाद:- "दशार्ण देश की राजधानी का नाम विदिशा है, जब तुम वहाँ पहुँचोगे तो विलास की साडी सामग्री तुम्हे मिल जायेगी। जब तुम वहां की सुहावनी, मनभावनी और नाचती लहरों वाली वेत्रवती नागी के तीर पर गर्जन करके उसका मीठा जल पियोगे तब तुम्हे ऐसा लगेगा मानो तुम किसी कंटीली भोंहों वाली कामिनी के होठों का रस पी रहे हो"
कालिदास का पहला नाटक मालविकाग्निमित्रम विदिशा के शुंग राजा अग्निमित्र और उसकी रानी की सेविका 'मालविका' की प्रेम कहानी पर आधारित है।
बाणभट्ट की 'कादम्बरी' भारतीय प्राचीन साहित्य का एक बड़ा महत्वपूर्ण उपन्यास मन जाता है। यह एक प्रेम कहानी है जो विदिशा के राजा शूद्रक के इर्द गिर्द घूमती है।
नए युग के कवियों ने भी विदिशा का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है।
जैसा की बंगाली कवि जीवंतदास की एक रचना अपने काव्य की नायिका वनलता सेन के केशों की तुलना विदिशा की रात से की है।
- " चुलतार कबेकार अंधकार विदिशार निशा"
अर्थात :- "वनलता सेन के केश तो थे विदिशा की रात्रि के युग-युग पुराने अन्धकार जैसे।
प्राचीन साहित्य में जो विदिशा का वर्णन मिलता है उससे तो यही प्रतीत होता है की विदिशा एक समय में बड़ा मशहूर शहर रहा होगा। आज से कहीं ज्यादा समृद्ध।
- दीपेश भावसार
विदिशा का इतिहास बेहद विशाल है। एक लेख में या एक किताब में समेटना असंभव। ऐसे तो नया विदिशा देखके बिलकुल भी नहीं लगता है कि यह वही विदिशा है जो कभी 6-5 ईसापूर्व में विश्व का एक बड़ा व्यापार केंद्र था।
विदिशा का उल्लेख कई प्राचीन भारतीय और विदेशी साहित्य में पाया जाता है। विदिशा की आर्थिक समृधि देखते ही बनती थी। इस आर्थिक समृधि का एक बड़ा महत्वपूर्ण कारण ये भी था की विदिशा भारत के दो बड़े व्यापर मार्ग पर स्थित था। पहला उज्जैन और कोशाम्बी (इलाहाबाद ) को जोड़ने वाला और दूसरा भरूच (गुजरात) और मथुरा को जोड़ने वाला।
विदिशा का उल्लेख वाल्मीकिकृत 'रामायण' , 'महाभारत', कालीदासकृत 'मेघदूत', कालीदासकृत 'मालविकाग्निमित्रम' , बाणभट्टकृत ' कादम्बरी' आदि में देखने को मिलता है।
कालिदास ने मेघदूत में लिखा है-
"तेषां दिक्षु प्रथित विदिशालक्षणा राजधानीम,
गत्वा सघं फलमविकलं कमुकत्वस्य लब्ध्वा''
अनुवाद:- "दशार्ण देश की राजधानी का नाम विदिशा है, जब तुम वहाँ पहुँचोगे तो विलास की साडी सामग्री तुम्हे मिल जायेगी। जब तुम वहां की सुहावनी, मनभावनी और नाचती लहरों वाली वेत्रवती नागी के तीर पर गर्जन करके उसका मीठा जल पियोगे तब तुम्हे ऐसा लगेगा मानो तुम किसी कंटीली भोंहों वाली कामिनी के होठों का रस पी रहे हो"
कालिदास का पहला नाटक मालविकाग्निमित्रम विदिशा के शुंग राजा अग्निमित्र और उसकी रानी की सेविका 'मालविका' की प्रेम कहानी पर आधारित है।
बाणभट्ट की 'कादम्बरी' भारतीय प्राचीन साहित्य का एक बड़ा महत्वपूर्ण उपन्यास मन जाता है। यह एक प्रेम कहानी है जो विदिशा के राजा शूद्रक के इर्द गिर्द घूमती है।
नए युग के कवियों ने भी विदिशा का उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है।
जैसा की बंगाली कवि जीवंतदास की एक रचना अपने काव्य की नायिका वनलता सेन के केशों की तुलना विदिशा की रात से की है।
- " चुलतार कबेकार अंधकार विदिशार निशा"
अर्थात :- "वनलता सेन के केश तो थे विदिशा की रात्रि के युग-युग पुराने अन्धकार जैसे।
प्राचीन साहित्य में जो विदिशा का वर्णन मिलता है उससे तो यही प्रतीत होता है की विदिशा एक समय में बड़ा मशहूर शहर रहा होगा। आज से कहीं ज्यादा समृद्ध।
- दीपेश भावसार